(राहुल लारजे)

Monday, September 19, 2011

टाफियां-कविता



टाफियां
पहले मुझे देख डरे सहमे से लगते थे
नहीं थी कोई जान-पहचान हम और उन में,
आते-जाते आफिस से पहुंचता था,
वापिस रोज अपने किराए के कमरे में,
घूरती रहती थीं कई मासूम आंखें
गांव के मकानों के आंगन से,
पास जा के कभी कुछ बतियानें की
कोशिश की इशारों से,
सरपट भाग जाते थे,
कभी पास न आते थे,
जैसे सांप छू गया हो
या कोई पागल आ गया हो,
सोचा इन भोले चेहरों से कैसे मुंह छुपाउ
क्‍यों न कुछ वक्‍त इन के साथ न बिताउं

एक दिन जाने कहां से आ गई
मैरी जेब में कहीं से कुछ टाफियां
और खत्‍म हो गई,
पल में सारी दूरियां
बांट दी उन सब को जो आते नहीं थे पास
चेहरे में उन सब के खुशी देखी,
मानो मिल गया हो आज उन को कुछ खास
वह दिन और आज का दिन है,
मुझे देख दोडे चले आते हैं
अंकल आ गए जोर से चिल्‍लाते हैं
कई तो सीधे गोदी में आने को तत्‍पर रहते हैं
मेरे कमरे में घूसे चले आते हैं
टाफियां-टाफियां चिल्‍लाते हैं

बन गया है एक अजीब सा सम्‍बन्‍ध इन
गांव के इन अबोध बच्‍चों से,
रूबरू हो गया हूं मैं इन ''टाफियों'' की ताकत से
टाफियां बीच न आती तो मैं शायद
आज भी उन के लिए एक अनजान चेहरा होता
एक पराया होता,कभी अंकल न होता.

Tuesday, August 31, 2010

भटक चुका है मानव-कविता

भटक चुका है मानव अब

धूमिल है आज हर दृश्य क्यूंकि
चारों और कोहरा छाया है
यह मात्र कोहरा नहीं धूल और राख से भरी आंधी है
जिस में जन्नत छुप सा गया है
भटक चुका है मानव 

अब इस मंजर में इंसान को कौन सी राह है ठीक
यह समझ नहीं आ रहा है
जीवन के चेहरे की ललिमा को पाने के लिए
वह इधर-उधर भटक रहा है
भटक चुका है मानव अब

धूमिल है आज हर दृश्य क्यूंकि
चारों और कोहरा छाया है
भटक चुका है मानव अब

भौतिक  युग में पूँजी को ही अपनी खुशी का
स्त्रोत समझ रहा है
मशीनों  के युग में वह यंत्रों से सवेदनाओं की
अपेक्षा कर रहा है
भटक चुका है मानव अब 

प्यार,सदभाव,मित्रता और बलिदान के
अनमोल भावो कि उपेक्षा कर रहा है
इसी लिए हर रिश्ते की नाज़ुक डोर को
आज दुत्कार रहा है
भटक चुका है मानव अब 

"मैं"और "सिर्फ मेरा" के अहम में वह
हुंकार मार रहा है
अपने कुऐं का मेंडक बन
उसी चारदीवारी को
जन्नते संसार समझ रहा है
भटक चुका है मानव अब

धूमिल है आज हर दृश्य क्यूंकि
चारों और कोहरा छाया है
खुदगर्जी के आलम में,
सरेआम सिर्फ अपना ही अपना
सोच रहा है
भटक चुका है मानव अब

नहीं है फ़िक्र दुनिया की उसे
बस मैं-मैं-मैं के फलस्पे को
गुन  गुना रहा है
भटक चुका है मानव अब

धूमिल है आज हर दृश्य क्यूंकि
चारों और कोहरा छाया है
भटक चुका है मानव अब
इस मंजर में इंसान को कौन सी राह है ठीक
यह समझ नहीं आ रहा है

Saturday, August 28, 2010

दोस्ती का मतलब-कविता

भूल जाते हैं वे कि दोस्ती शब्द का मतलब कितना गहरा है

अपने स्वार्थ के लिए मित्रता का ढोंग करते हैं
कुछ लोग् आज-कल समाज में,
भूल जाते हैं वे कि दोस्ती शब्द का मतलब कितना गहरा है
उन के लिए दोस्ती महज
एक स्वार्थपूर्ति का जरिया है और
धोखा देना उन के लिए
एक उतम स्तर की कला है
भूल जाते हैं वे कि दोस्ती शब्द का मतलब कितना गहरा है

मतलब पूरा होने पे दोस्त की पीठ पर भी
छुरा घोंपने से बाज़ नहीं आते ऐसे लोग
फिर भी सरेआम कहते हैं कि
हम सच्चे परम सखा हैं
भूल जाते हैं वे कि दोस्ती शब्द का मतलब कितना गहरा है

कहाँ सुनने देखने को मिलता है वह उदाहरण
कि कृष्ण-सुदामा,अर्जुन
जैसे लोग आज भी हैं
कि राम-सुग्रीव और विभीषण
जैसे मित्र
जिन्होंने निभाया था अपने से कृतज्ञ होने
का कर्तव्य

आज मात्र दिखावा करते हैं वोह भीड़ में
अच्छे कपड़ों में दिखने वाले काले दिलों
के मालिक
अपनी  जन्नत को गुलज़ार करने की  फ़िक्र
उन को
साथियौं से दगा करने को जायज़ ठहराती है
तभी तो उन्होंने स्वयं को हर अहम मूल्यों से 
आज दर किनार कर लिया है
भूल जाते हैं वे कि दोस्ती शब्द का मतलब कितना गहरा है

Wednesday, August 25, 2010

बदल गया है आदमी-कविता

बदल गया है आदमी

सब कुछ अब दिखावा है,नहीं है कुछ वास्तविक
रिश्तों की दीवार अब ढहने के कगार पर है
हर कोई मजबूरी में यह सब निभा रहा है
दोस्ती,रिश्ते और ईमान अब किताबों और
ख्यालों में ही अच्छे लगते हैं

स्वार्थ ने इस कद्र गिरा दिया है इंसान को कि
हर जगह वोह अपना ही फायदा देख रहा है
हर मुकाम पे वह अपना ही लाभ देख रहा है
चाहे इस के लिए नजरों में गिरना पड़ रहा है।
इर्ष्या कि आग बढ़ रही है चारों ओर अब
हर कोई आगे निकलना चाह रहा है

इस भरे संसार को अब खोकला बना रहा है
सिर्फ अपना नफा हो बाकी सब का नुक्सान हो
इसी फलसफे को वह गुनगुना रहा है
चेहरे पे होती है नकली मुस्कान हर किसी की
जो अंदर ही अंदर रो रहा होता है
हासिल तो कर लेता है वह हर कुछ
अपनी भरी सी लगने वाली जिंदगी में
पर अंदर ही अंदर सब कुछ कुछ खो चूका होता है

पूँजी वादी या बाजारी व्यवस्था का मंजर है या कुछ ओर
पर इस ने सब कुछ बदल के रख दिया है
हर किसी को अब हरे नोट ही अच्छा लगता है
बाकी दुनिया जाये भाढ में बस
हर कोई कहता है
मुझे मेरा परिवार ही अच्छा लगता है

Tuesday, August 24, 2010

लेह का दर्द-कविता




"लेह का दर्द "


जाने क्योँ 
सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया



हम भी तो आखिर तुम्हारी ही कला में
सृजित एक तुच्छ आयाम हैं 
जीवन के अजब सरोवर में गोते लगाने
तुम्‍हारे द्वारा ही लाए गये हैं.
पर क्योँ सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया 

रोजाना की तरह दिनचर्या पूर्ण कर
अपने तबेले में चंद सांसे चैन की ले कर
नींद की आगोश में ही तो था 
सोचा कि जो बरस रहा है वह प्रभु इंद्र
का मात्र मौसमी ताप ही तो था
किन्तु रात्रि को जो बरपा वह कुछ आम नहीं था 
यह कई मासूमों को साथ में ले जाने वाला था 
जाने क्योँ .
सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया 

बुज़ुर्ग,माता-बहने ,छोटे नन्हे दुलारे-प्यारे,
गहरी नींद में थे मेरे जैसे बहुत सारे
वख्त ही नहीं मिला सम्भलने का ,
कि कहर ऐसा बरपा ना थमने का ,
वह घर जिसे जन्नत समझ कर बसाया था
मिटटी के ढेर में तब्दील हो गया 
जो कुछ भी बटोर के रखा था 
सब इधर-उधर बिखर गया 
जाने क्योँ 
सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया 

बिखरे संसार को देख अब भाव शुन्य हूँ ,
आंसुओं की गति को थामने में लगा हूँ ,
समझ नहीं आ रहा कि हम ने बुरा क्या किया था 
एक पहाड़ी पर ही तो घर बसाया था 
कहाँ गुम् हो गये इस आंधी में मेरे सहचर,
जिन्होंने जिंदगी भर साथ चलने का
वादा निभाया था.
जाने क्योँ 
सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया 

बसाई दुनिया के बिखर जाने का गम
सताएगा मुझ को जीवन भर,
जगा-जगा के सताएगी वह काली रात की यादें
मुझे साल दर साल रात भर ,
तकदीर ने इस बार हुम से दगा किया 
जीवन भर के लिए ना भूलने वाला
जख्म दे दिया 
जाने क्योँ ..?
सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया 

जाने क्योँ 
सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया 

Friday, April 23, 2010

शीत काल हिमालय का-कविता



शीत काल हिमालय का

शाम ढल रही है और सन्नाटा छा रहा है,
बर्फ के इन गलियारों में कोई नज़र नहीं आ रहा है I
घरों में दुपक चुके हैं लोग ,
शीत के प्रकोप से ,


कुछ अपने गृह सदस्यों के साथ रात्रि भोज की तयारी में ,
कुछ चिर निद्रा में जाने को आतुर,
शरद ऋतू में यही हिमालय की काया है I


थम जाती है जिन्दगी इन दिनों में,
लेकिन उर्जा खत्म नहीं होती बाशिंदों की,
यही तो दिन हैं वोह आराम के ,
मन के सूकून के ,

अध्यात्मिक शांति के ,

और इसी में उन्हें सदियों से रहना भाया है I
येही तो "मेरी दुनिया" के हिमालय की माया है I