टाफियां
पहले मुझे देख डरे
सहमे से लगते थे
नहीं थी कोई
जान-पहचान हम और उन में,
आते-जाते आफिस से
पहुंचता था,
वापिस रोज अपने
किराए के कमरे में,
घूरती रहती थीं कई
मासूम आंखें
गांव के मकानों के
आंगन से,
पास जा के कभी कुछ बतियानें
की
कोशिश की इशारों से,
सरपट भाग जाते थे,
कभी पास न आते थे,
जैसे सांप छू गया हो
या कोई पागल आ गया
हो,
सोचा इन भोले चेहरों
से कैसे मुंह छुपाउ
क्यों न कुछ वक्त
इन के साथ न बिताउं
एक दिन जाने कहां से
आ गई
मैरी जेब में कहीं
से कुछ टाफियां
और खत्म हो गई,
पल में सारी दूरियां
बांट दी उन सब को जो
आते नहीं थे पास
चेहरे में उन सब के
खुशी देखी,
मानो मिल गया हो आज
उन को कुछ खास
वह दिन और आज का दिन
है,
मुझे देख दोडे चले
आते हैं
अंकल आ गए जोर से
चिल्लाते हैं
कई तो सीधे गोदी में
आने को तत्पर रहते हैं
मेरे कमरे में घूसे
चले आते हैं
टाफियां-टाफियां
चिल्लाते हैं
बन गया है एक अजीब
सा सम्बन्ध इन
गांव के इन अबोध बच्चों
से,
रूबरू हो गया हूं
मैं इन ''टाफियों'' की ताकत से
टाफियां बीच न आती
तो मैं शायद
आज भी उन के लिए एक
अनजान चेहरा होता
एक पराया होता,कभी अंकल न होता.


