(राहुल लारजे)

Tuesday, August 24, 2010

लेह का दर्द-कविता




"लेह का दर्द "


जाने क्योँ 
सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया



हम भी तो आखिर तुम्हारी ही कला में
सृजित एक तुच्छ आयाम हैं 
जीवन के अजब सरोवर में गोते लगाने
तुम्‍हारे द्वारा ही लाए गये हैं.
पर क्योँ सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया 

रोजाना की तरह दिनचर्या पूर्ण कर
अपने तबेले में चंद सांसे चैन की ले कर
नींद की आगोश में ही तो था 
सोचा कि जो बरस रहा है वह प्रभु इंद्र
का मात्र मौसमी ताप ही तो था
किन्तु रात्रि को जो बरपा वह कुछ आम नहीं था 
यह कई मासूमों को साथ में ले जाने वाला था 
जाने क्योँ .
सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया 

बुज़ुर्ग,माता-बहने ,छोटे नन्हे दुलारे-प्यारे,
गहरी नींद में थे मेरे जैसे बहुत सारे
वख्त ही नहीं मिला सम्भलने का ,
कि कहर ऐसा बरपा ना थमने का ,
वह घर जिसे जन्नत समझ कर बसाया था
मिटटी के ढेर में तब्दील हो गया 
जो कुछ भी बटोर के रखा था 
सब इधर-उधर बिखर गया 
जाने क्योँ 
सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया 

बिखरे संसार को देख अब भाव शुन्य हूँ ,
आंसुओं की गति को थामने में लगा हूँ ,
समझ नहीं आ रहा कि हम ने बुरा क्या किया था 
एक पहाड़ी पर ही तो घर बसाया था 
कहाँ गुम् हो गये इस आंधी में मेरे सहचर,
जिन्होंने जिंदगी भर साथ चलने का
वादा निभाया था.
जाने क्योँ 
सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया 

बसाई दुनिया के बिखर जाने का गम
सताएगा मुझ को जीवन भर,
जगा-जगा के सताएगी वह काली रात की यादें
मुझे साल दर साल रात भर ,
तकदीर ने इस बार हुम से दगा किया 
जीवन भर के लिए ना भूलने वाला
जख्म दे दिया 
जाने क्योँ ..?
सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया 

जाने क्योँ 
सब कुछ मिटा के रख दिया ,
चंद पलों में सब तबाह कर के रख दिया 

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