(राहुल लारजे)

Friday, April 23, 2010

शीत काल हिमालय का-कविता



शीत काल हिमालय का

शाम ढल रही है और सन्नाटा छा रहा है,
बर्फ के इन गलियारों में कोई नज़र नहीं आ रहा है I
घरों में दुपक चुके हैं लोग ,
शीत के प्रकोप से ,


कुछ अपने गृह सदस्यों के साथ रात्रि भोज की तयारी में ,
कुछ चिर निद्रा में जाने को आतुर,
शरद ऋतू में यही हिमालय की काया है I


थम जाती है जिन्दगी इन दिनों में,
लेकिन उर्जा खत्म नहीं होती बाशिंदों की,
यही तो दिन हैं वोह आराम के ,
मन के सूकून के ,

अध्यात्मिक शांति के ,

और इसी में उन्हें सदियों से रहना भाया है I
येही तो "मेरी दुनिया" के हिमालय की माया है I

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