बदल गया है आदमी
सब कुछ अब दिखावा है,नहीं है कुछ वास्तविक
रिश्तों की दीवार अब ढहने के कगार पर है
हर कोई मजबूरी में यह सब निभा रहा है
दोस्ती,रिश्ते और ईमान अब किताबों और
ख्यालों में ही अच्छे लगते हैं
स्वार्थ ने इस कद्र गिरा दिया है इंसान को कि
हर जगह वोह अपना ही फायदा देख रहा है
हर मुकाम पे वह अपना ही लाभ देख रहा है
चाहे इस के लिए नजरों में गिरना पड़ रहा है।
इर्ष्या कि आग बढ़ रही है चारों ओर अब
हर कोई आगे निकलना चाह रहा है
इस भरे संसार को अब खोकला बना रहा है
सिर्फ अपना नफा हो बाकी सब का नुक्सान हो
इसी फलसफे को वह गुनगुना रहा है
चेहरे पे होती है नकली मुस्कान हर किसी की
जो अंदर ही अंदर रो रहा होता है
हासिल तो कर लेता है वह हर कुछ
अपनी भरी सी लगने वाली जिंदगी में
पर अंदर ही अंदर सब कुछ कुछ खो चूका होता है
पूँजी वादी या बाजारी व्यवस्था का मंजर है या कुछ ओर
पर इस ने सब कुछ बदल के रख दिया है
हर किसी को अब हरे नोट ही अच्छा लगता है
बाकी दुनिया जाये भाढ में बस
हर कोई कहता है
मुझे मेरा परिवार ही अच्छा लगता है
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