(राहुल लारजे)

Tuesday, August 31, 2010

भटक चुका है मानव-कविता

भटक चुका है मानव अब

धूमिल है आज हर दृश्य क्यूंकि
चारों और कोहरा छाया है
यह मात्र कोहरा नहीं धूल और राख से भरी आंधी है
जिस में जन्नत छुप सा गया है
भटक चुका है मानव 

अब इस मंजर में इंसान को कौन सी राह है ठीक
यह समझ नहीं आ रहा है
जीवन के चेहरे की ललिमा को पाने के लिए
वह इधर-उधर भटक रहा है
भटक चुका है मानव अब

धूमिल है आज हर दृश्य क्यूंकि
चारों और कोहरा छाया है
भटक चुका है मानव अब

भौतिक  युग में पूँजी को ही अपनी खुशी का
स्त्रोत समझ रहा है
मशीनों  के युग में वह यंत्रों से सवेदनाओं की
अपेक्षा कर रहा है
भटक चुका है मानव अब 

प्यार,सदभाव,मित्रता और बलिदान के
अनमोल भावो कि उपेक्षा कर रहा है
इसी लिए हर रिश्ते की नाज़ुक डोर को
आज दुत्कार रहा है
भटक चुका है मानव अब 

"मैं"और "सिर्फ मेरा" के अहम में वह
हुंकार मार रहा है
अपने कुऐं का मेंडक बन
उसी चारदीवारी को
जन्नते संसार समझ रहा है
भटक चुका है मानव अब

धूमिल है आज हर दृश्य क्यूंकि
चारों और कोहरा छाया है
खुदगर्जी के आलम में,
सरेआम सिर्फ अपना ही अपना
सोच रहा है
भटक चुका है मानव अब

नहीं है फ़िक्र दुनिया की उसे
बस मैं-मैं-मैं के फलस्पे को
गुन  गुना रहा है
भटक चुका है मानव अब

धूमिल है आज हर दृश्य क्यूंकि
चारों और कोहरा छाया है
भटक चुका है मानव अब
इस मंजर में इंसान को कौन सी राह है ठीक
यह समझ नहीं आ रहा है

2 comments:

  1. आज के इन्सान की छवि को चित्रित करती रचना |
    बहुत खुबसूरत रचना |

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  2. शब्द पुष्टिकरण हटा दें तो टिप्पणी करने में आसानी होगी ..धन्यवाद
    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो NO करें ..सेव करें ..बस हो गया

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